Thursday, 17 August 2017

मेरी एक ग़ज़ल देखें 
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आग दिल में लगाने से क्या फ़ायदा 
अपना ही घर जलाने से क्या फ़ायदा 

जब परिंदे ना चहकेंगे कल शाख पर 
इस चमन को बचाने से क्या फ़ायदा 

इल्म के साथ हासिल न हो अक्ल तो 
बे -वजह  फैज़ पाने से  क्या फ़ायदा 

आज तो  हम तुम्हारे मुक़ाबिल नहीं 
अब  हमें  आज़माने से क्या  फ़ायदा  

आँख  बरसे   नहीं , रूह  तड़पे  नहीं 
यूँ ग़ज़ल गुनगुनाने से क्या फ़ायदा 

बेरुखी ऐसी  'ज़ीनत' उन आँखों में है 
बेसबब आने- जाने  से क्या फ़ायदा 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 15 August 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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क़िस्मत का मेरे यारों जब टूटा सितारा था 
इक  मेरे  सहारे  को  बस  मेरा  खुदारा था 

गर्दिश ने जो घेरा तो कुछ काम  नहीं आया 
कहने  के लिए यूँ तो  कश्ती  का सहारा था 

हम  सब्र से  बैठे  थे चीख़ा ना  गुज़ारिश की 
सर काट के ज़ालिम भी मज़लूम से हारा था 

हर शब् को उतरते थे हम पर ही कई आफ़त 
मुश्किल  की  घटाएँ  थीं घर एक हमारा था 

हर हाल में बस 'ज़ीनत ' हम ज़ेर रहे दम तक 
कोई   ना  सहारा  था  ,कोई  ना  हमारा  था 
----कमला सिंह ' ज़ीनत'

Saturday, 8 July 2017

एक ग़ज़ल 
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जब  वो   मेरी  नज़र  हो  गया 
खुद-ब-खुद मोअत्तबर हो गया 

एक   खाली   मकाँ    हम   रहे 
वो  दिलो  जां  ज़िगर  हो  गया 

अब   कोई  और  चौखट   नहीं
आख़री   मेरा   दर   हो   गया  

धुप   आती   नहीं    राह     में 
राह   का   वो  शजर  हो  गया 

रफ़्ता-  रफ़्ता   मेरी   चाह   में 
कितना  वो  बालातर  हो  गया  

दिल का 'ज़ीनत' वो है बादशाह 
दौलते   मालो  ज़र   हो   गया 

---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Monday, 3 July 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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आग  हरसू  लगाए  फिरते  हो 
बादलों   को   डराए  फिरते  हो 

कौन  जाने की कब ख़ुदा बदले 
आजकल  बुत  उठाए फिरते हो 

कितने  मासूम  खा  गए धोका 
ऐसी   सूरत  बनाए   फिरते  हो 

अंधे   बहरों  के   बीच  ऐ  साधू 
कौन  सा  धुन सुनाए फिरते हो 

अपनी  मुट्ठी में  आँधियाँ  लेकर 
रौशनी  को   बुझाए   फिरते  हो 

'ज़ीनत' तो पर्दा कर गयी कब की 
लाश  किसकी  उठाए  फिरते  हो 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Friday, 30 June 2017

एक ग़ज़ल आपके हवाले 
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उस  दिन  पगले  हाथ  से  तेरे छूट गए 
शीशे   जैसा   गिरकर   देखो   टूट  गए 

तेरे   मेरे   जो   भी   रिश्ते   थे    कोमल 
गर्म   हवा   के  चलते  ही  सब रूठ  गए 

प्यास लगी थी मुझको लेकिन सच मानो 
कितनी मुश्किल से मुझ तक दो घूँट गए 

राह  हमारी  बिलकुल  ही  सुनसान  रही 
रहज़न   आये    यादें    तेरी    लूट   गए 

चलते-  चलते   , धीरे -  धीरे   रस्ते  पर 
ग़म   के   सारे    छाले   मेरे   फूट   गए 

क्या अब जीना 'ज़ीनत' बोलो घुट-घुट कर 
ओखल  में  हम  साँसें  सारी   कूट   गए 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Tuesday, 27 June 2017

एक ग़ज़ल आपके हवाले 
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एक सजदा वही  क़याम हमारी  नज़र  में  है 
अब   तक  वही  इमाम   हमारी  नज़र  में है 

मसरूफ हम है जिसके तआक्कुब में रात दिन 
ऐसा    ही   एक   नाम   हमारी   नज़र  में है 

देखोगे तुम तो  शाम-ए- अवध  भूल जाओगे 
इतनी   हसीन    शाम   हमारी   नज़र  में  है 

दीदार  जिसकी  करते थे  हम ताज की तरह 
खुश- रंग ,  दरो-बाम ,  हमारी  नज़र  में  है 

हर   वक़्त   जो   हमारी   हदें   खींचते   रहे 
उनका   भी  एहतराम   हमारी  नज़र  में  है 

सब  कुछ  फ़ना है 'ज़ीनत 'यादों की भीड़ में 
बस  इक शिकस्ता -जाम  हमारी नज़र में है 
-----कमला सिंह 'ज़ीनत '

Wednesday, 21 June 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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अजीब  लोग  हैं  तेवर   बदलते  रहते हैं 
दरो - दीवार  कभी  घर  बदलते  रहते हैं 

ज़मीन प्यारी है  इतनी उड़ान की  ख़ातिर 
परिंदे  रोज़  अलग  पर  बदलते  रहते हैं 

लिखी है खानह बदोशी हमारी क़िस्मत में 
क़दम-क़दम पे यह मंज़र बदलते रहते  हैं 

तबीब  आप  परेशां न हों खुदा  की  क़सम 
अजीब  ज़ख़्म  हैं  नश्तर  बदलते रहते हैं 

कि अब  तो  नेज़े भी बे-फिक्र हो  के बैठेंगे 
शहीद  होने  को  यह सर  बदलते रहते हैं 

ख़ुदा को भूल के ऐ 'ज़ीनत' जी मुसीबत में 
अंगुठियों  के  ही  पत्थर  बदलते  रहते हैं 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '